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Saturday, 9 May 2020

ममत्व


जिंदगी यूँ एक स्पर्धा बन गयी है,
हम आज का सोचते, आज में ही जीते,
अपनी सफलताओं पे
गर्व करते, मुस्कुराते, इठलाते,
और हो भी क्यूँ न।
यही तो हमेशा सीखा है हमने,
जिंदगी एक दौड़ है,
जो जीता, वो सिकंदर,
बाकी सारे अंधकार के अंदर।

बस इस भागदौड़ में
अक्सर ज़ेहन से ये बात निकलती,
की किसने इस स्पर्धा के लिए
हमे तैयार किया,
हमे अपने स्नेह की सानिध्य में रखते
अपने आवरण से बाहर का दृश्य दिखाया
हाँ, वो माँ ही तो थी।

दयालु, प्यारी, मासूम
अगणित अलंकार हैं माँ के लिए।
लेकिन ज़रा गौर फरमाओ,
तो कही निडर, निर्भय, और निर्भीक है माँ,
जो कवि अपनी कविताओं में कहना भूल गए शायद।

आखिर कौन है ऐसा और
जो अपने हृदय के टुकड़े को
सालों के लिए खुद से दुर जाने दे

कौन है ऐसा और
जो अपना पूरा जीवन
सिर्फ इसी ख्वाब में व्यतीत करे
की उसके बच्चे दुनिया मे
अपना परचम लहराए।

ये माँ ही तो है।
और कौन भला।
तभी शायद कहते हैं
माँ को ईश्वर के
ऊपर का दर्जा प्राप्त है
वर्ना इतना निस्वार्थ प्यार
इन्सानी चरित्र के परे है।

माँ है तो
अस्तित्व है
माँ नही
तो सब विलीन

Wednesday, 23 March 2016

श्वेत पट पर श्याम चित्रित होली


Often people complain that their life is too "black and white." What they forget is, both black and white are colours and doesn't define the aspects of being "colourless."

श्वेत पट पर श्याम चित्रित होली 

निद्रा है, स्वप्न भी है 
पर जो अंतरात्मा झंझोरती 
वो वास्तविकता से सामना भी है 
बेमन से दफ्तर की ओर बढ़ते कदम 

अनायास ध्यान आया 
रँगो का त्यौहार है 
होंठो पे एक मुस्कुराहट भी 
अनायास ही झलकी 

ख़ुशी निश्चिंततः ना थी 
हालाँकि ये गम की हँसी भी ना थी 
तो आखिर माज़रा क्या था?

वो कुछ नहीं, बस बचपन
और बीता वक़्त 
पास आ कर 
जरा मखौल कर गए थे

उसी क्रिया की प्रतिक्रिया थी 
मखौल  ही तो था 
वरना होली दिवाली में 
ये दीवालापन मस्तिष्क का
सवाल ही नहीं था 

सर झटक प्रयास किया 
खुद को वास्तविकता में वापस लाने का 
लेकिन ये कमबख्त सोच 
अपने घोड़े आज किसी 
और दिशा में दौड़ाने को अड़ी थी 

आवाज़ दी उसने 
क्या होली भाई तुम्हारे लिए?
यही अब जिंदगी की सच्चाई है 
कल में झूलना छोड़ दो 
इसी में तुम्हारी भलाई है 

मैंने सर झुका 
नीम के काढ़े जैसे 
उस अंतरात्मा की आवाज़ 
पर हामी भर दी 
और बोझिल क़दमों से 
अपने गंतव्य की ओर  बढ़ा 

दुहाई हो, 
इस श्वेत-श्याम जीवन की 
मैं बड़बड़ाया 

तभी, हाँ, बिलकुल तभी,
बिजली के कौंध सा 
आँखों के सामने 
अनगिनत रंगो के मेल का 
एक जोरदार धमाका हुआ 

और मेरी दृष्टि 
स्वयतः फैलती चली गयी 
ये रंग, जाने-पहचाने से थे 
अरे! इनसे तो बहुत पुराना नाता था,
मैं कैसे भूल गया?

आज भी याद है 
मोर को नृत्य करते 
जब पहली बार देखा था 
और इन रँगो से रूबरू हुआ 

कदम ठिठक गए 
इस बेमौके की याद पर 
और सोच फिर से 
सैर को निकली

लेकिन तभी 
एक दूसरी आवाज़ उठी 
मेरे  अंतरात्मा से ही 
और कहा 

मैं ही आदि, और मैं ही अंत 
बचपन से तुमको 
है इसकी खबर 

फिर किसने कहा 
श्वेत-श्याम की होली
होली नहीं होती?

मैंने ही तो रचा है 
आखिरकार, वो भी दो रंग हैं 
तुम भेदभाव क्यों करते हो? 

मत करो 
बस आनंद लो 

क्या पता, आने वाला कल
इन दो रँगो  की ही 
बुनियाद पर बना हो? 

बस आनंद लो... 

वो आवाज़, हाँ वही आवाज़ 
पहले भी कई दफा सुनी थी 
अनजान  हो कर भी 
जानी-पहचानी सी थी 

मन तो अभी भी बेमन था 
लेकिन दिल की धड़कनों ने 
कुछ अलग सा रुख ले लिया 

होंठों पे फिर एक 
मुस्कुराहट थी 
और क्यों  ना हो भई 
होली का त्यौहार जो था  


Thursday, 30 May 2013

KOI HAI SAATH


Well, writing after really a long time. Was entangled in earthly stuffs. You know, stuffs.......
Anyways, this new poem is in Hindi. Yeah, I love Hindi as much as English. You may be thinking that why an English writer like me venture into the realm of Hindi from time to time. The answer is, there are some things which are expressed best in Hindi and Hindi only. Okay then, hope you will enjoy it. And do not forget to leave your feedback. They really, really help me to improve.........

कोई है साथ

चला जा रहा था बस
 ना क्षितिज का ठौर
ना  किसी मंजिल का ठिकाना
बस चल रहा एक दिशा में
चेहरे पर क्या भाव थे
खुद मैं नहीं जनता
बस पाँव  ले जा रहे थे

दर्द ? हाँ, दर्द तो था
लेकिन कितना ?
खुद हँस रहा था इस सवाल पर
हताशा, जो पहले दिल पे छाई थी
अब तो मेरी दुनिया ही रंगी है उसमे
और ले-दे कर बची निराशा
वो तो इन दोनों की परम सहेली है
अंततः वो भी साथ हो ली मेरे

सोच कहाँ थी ?
विचार कहाँ थे ?
मस्तिष्क के पट पर
एक चलचित्र सी
चल रही थी दोनों की
जिसने  आँखों को
चौंधिया दिया था

इन्ही ख्यालों में
डूबता-उतराता
बस बढ़ते जा रहा था
रेत पर पैरों के निशान बनाते हुए

तभी  आभास हुआ
कोई साथ हो लिया है
आश्चर्यचकित, मैंने देखा उसे
यह भला कौन साथ हुआ
और साथ भी किसके
एक ऐसे इंसान के
जो आज शुन्य में
परिवर्तित  हुआ जा रहा है
जिसका वजूद ही एक त्रास है
उसके खुद के  लिए

खैर, जो भी है
उसकी मर्ज़ी
साथ देने को तो और कई थे
इस अभागे को मैं ही मिला
माहौल की नीरवता के वास्ते
मैंने ही आखिरकार पूछ लिया
कौन हो भाई तुम ?
और मेरे साथ क्यूँ हो लिए ?
वो इंसान  सिर झुकाए
मेरे साथ चलता रहा
और मुस्कुराकर बोला
भगवान्
हा! भगवान् ?!
यह अविश्वास नहीं था
मेरे मन में
बस नियति पे हँसा  था

अब मिले हो प्रभु
मैंने हँसते हुए प्रणाम किया
अब दर्शन दिए हैं ईश्वर ने
कहिये कैसे कृपा की

उसने, जो खुद को बता रहा था
भगवान्, सृष्टि-संचालक, दुखों का हर्ता,
मेरे कंधे पर हाथ रखा
और बोला मेरे कानों में
एक बार देखो अपने पीछे
खुद के पैरों के निशानों को
जो अथाह रेत में उभरे पड़े हैं

मैंने उसे अविश्वास से घूरा
क्या बोल रहा है यह ?
आज जब जिंदगी रूठ कर चली गयी
एक बेजान शरीर छोड़ कर
और तकदीर ने मुँह मोड़ा
तबाही का पैगाम  लिख कर
यह आया है मेरे पास
कहाँ था अब तक ?
जब इस विशाल संसार में
कोई नहीं था अपना कहने को
जब दुनिया ने त्याग किया था मेरा
बिना किसी  कसूर के
आप तब कहाँ थे हजरत ?
और आया भी है तो आज
अन्धकार की हमजोली बन कर

क्या चाहता है मुझसे ?
हाँ, पीछे पलटने को कह रहा था
देखूं भला क्या मंशा है इसकी
इस सोच के साथ
पीछे पलटा मैं

देखा, तो बस देखते रह गया
नीले आकाश के तले
और स्वर्णिम रेत में
उभरे थे निशान पाँव के
जगमगाते, झिलमिलाते
मेरी दृष्टि वहाँ पहुँच गयी
जो  शायद छुपी थी पहले

देखा की मेरे अच्छे दिनों में
जब मैं खुश रहने का आदि था
और एक अनजान उर्जा से
दिल उत्साहित रहता था
दो  जोड़ी पैरों के निशान थे
जो साथ में चले आ रहे थे

लेकिन  जल्दी ही वो नज़ारा दिखा
जिसने मुझे इस दशा में पहुँचाया
वक़्त,  वो वक़्त जिसने कमजोरी की
ऐसी परिभाषा लिखी
की मैंने खुद को
ख़त्म  करने में भी
असमर्थ पाया
और निश्चय ही वहाँ भी थे
पैरों के निशान
सिर्फ एक जोड़ी  में
दूसरा जोड़ा गायब था

अब  मुस्कुराने की बारी मेरी थी
पलटा मैं वापस
और कहा उस 'भगवान्' से
छोड़ तो तुमने भी दिया ही
जब मुसीबतों ने मुझे घेरा
बस  सुख के साथी बने रहे
क्या फर्क है भई तुम में
और उन बाकी सांसारिक जीवों में ?

यह क्या ?
फिर वही मुस्कराहट ?!
वही हृदय में
शूल की भाँती
लगती मुस्कराहट
इससे पहले मैं पूछता कुछ
वो फिर मेरे समीप आया
और जो कहा मुझसे
आज  भी शायद
स्तब्ध खड़ा हूँ मैं
वही का वही उसे सुनकर
कहा उसने
मैं तब भी साथ था
आज भी साथ ही हूँ
बस अंतर इतना सा है
तुम्हे बिठा  लिया
अपने  कंधे पर
यह पैरों के निशान
मेरे ही हैं
कारण ?
अब वह बताने की
शायद जरुरत नहीं

बिजली सी कौंध गयी
मेरी रगों में
झटके से उसकी ओर मुड़ा
पर अब भला
वह क्यूँ दिखने लगा
जब होश में आया
तो हाथ  खुद-ब -खुद
दिल पर पहुँचा
और यथार्थ की तहें
खुलती गयीं

अकेला ? और मैं ?
हा! फिर हँस  रहा था मैं
पागलों की तरह
जोर-जोर से
चिल्ला-चिल्ला कर

कैसे व्यक्त करता
मैं अपने उद्गारों को
आँखों में
जो सरिता उमड़  पड़ी थी
बस वही थी
मेरी श्रधांजलि

फिर चल पड़ा था
इस बार
एक ऐसे साथी के साथ
जो तब भी मेरे साथ होगा
जब मैं खुद के साथ
ना  रहूँगा.................


 

 








 





   





Friday, 28 January 2011

SHAYAD HUME BHI THA


Okay, first thing first; to all my admirers out there, I am very thankful to you for your intense and loving appreciation for my works till now. I hope that in future too, I will be making you happy with such stuffs. Secondly, this work here is according to me, the most mature one of mine till date and I seriously hope you people are going to love it. So like any other time, feel free to give your precious feedback which is crucial for  further perfection in my writings. Thank You :-)
P.S. : All the expressions and emotions in this poem are entirely the product of imagination from the poet's mind. With all due respect, please don't dare to relate them with his personal life!!

शायद हमें भी था

सुना था यारों की महफिलों में
दोस्तों की जमातों में
दीवानों के झुण्ड में
क्या होता है प्यार
लेकिन जिसने भी पुछा
गर्दन हिला कर साफ़ कहा
हम क्या जाने यार
शान से कहते थे उनसे
अपने को नहीं होने वाला
हम तो यूँ ही अच्छे हैं
खुद हैं इस दिल का रखवाला
लेकिन कुछ समय से शक है
की शायद हमें भी था

बात कुछ भी नहीं थी
बातचीत ही तो सिर्फ होती थी
कब दिल का रुख मुड़ गया
जिद्द्पन का पक्षी उड़ गया
हम नहीं जानते
जानते तो बस इतना
की धीरे धीरे
इंतज़ार होने लगा
मौका ढूँढा जाने लगा
और अपनी जिंदगी में
अजीब उलटफेर हो गया
तभी यह असंभव ख्याल आया
की शायद हमें भी था

हर वो गाना
हर वो तराना
जिसे सुनकर हँसते थे
दीवानों की मजबूरी पर
अब, जब खुद उन्ही मजबूरों में थे
तब पता चला
क्या हुआ करती है
उनकी मजबूरी
खुद पर हँसते
खुद से कहते
आखिर तू भी वहीँ गिरा
जहाँ न गिरना था
तू भी वहीँ फिसला
जहाँ खुद को संभालना था

अजीब सी बेहोशी छाई थी
दिलों दिमाग में
कितना भी खुद को रोकें
नहीं रह पा रहे थे
अपने काबू में
खुद पर झुंझलाते
खुद ही को दुत्कारते
लेकिन जहाँ उनके शब्द आते
हम जैसे की सबकुछ भुला देते
अभी भी रट थी
हमें नहीं है
लेकिन अब सोचते हैं
तो याद आता है
की शायद हमें भी था

उनकी एक तारीफ़ को
बरसों के प्यासे की तरह
हम तरसते थे
और वो जो दो शब्द
हमारी तारीफ़ में बोल देतीं
तो ऐसा लगता की जैसे
सालों बाद बारिश हुई हो
किसी बंजर जमीन पर
लेकिन खुदा जाने क्यूँ
उनकी तारीफ़ करते
हमारी रूह कांपती
हम सोचते
न जाने वो
अपने मन में क्या सोचें
अब लगता है
यहीं गलती हुई
जो हमने दिल की बात
दिल में ही रखी
खैर, जो होना था वो हुआ
अब तो
इसी ख्याल से तसल्ली है
की शायद हमें भी था

एक वो दिन था
एक यह आज का दिन है
भूले नहीं भूल पाते
कितना भी कोशिश करें
नहीं निकाल पाते
जब उन्होंने कहा था
वो किसी और की हैं
उनका दिल किसी और का है
जबरदस्त धक्का लगा हमे
सपने में भी
नहीं सोचा था ऐसा
जो अनहोनी थी
वो हो गयी
जो असंभव था
अब संभव है
वो तो कोई और ही था
हम कभी नहीं
जिसके लिए
दिल उनका धड़कता  था
जिसके साथ वो जिंदगी चाहती थीं
हम तो बस यूँ ही थे
एक अच्छा दोस्त
एक अच्छा सलाहकार
एक अच्छा इंसान
और न जाने क्या क्या
ऐसे मौके पर
झूठ नहीं बोलेंगे
रोये थे, हाँ रोये थे हम
फूट फूट के रोये थे
भ्रम में पड़े हुए थे
की शायद हमें भी था

अब फिर से
सब पटरी पर है
वही यारों की महफ़िलें
वही दोस्तों की जमातें
वही दीवानों के दुखड़े
बात उनसे आज भी होती है
मन ही मन में आज भी रोते हैं
लेकिन अब दिल शांत है
उपर से अब भी धड़कता  है
पर अन्दर बिलकुल शांत है
गर्व है अपने उपर
आज तक किसी को
भनक नहीं पड़ने दी
जो बीती थी हम पर
दोस्तों ने दो एक बार पूछ कर छोड़ दिया
हमने भी हंसी में
अपने दुःख को धूल की तरह उड़ा दिया
जैसे पहले थे
अब भी हैं
कुछ भी नहीं बदला
बदली तो सिर्फ
हमारी सोच
की अब फिर
इस जनम में तो नहीं हो पायेगा हमें
वही जो लगा था
की शायद हमें भी था.....

.

Thursday, 20 May 2010

HO CHALI SHURUAT


After a long time I wrote this poem in Hindi because I was missing my first language a lot and besides that, I thought it would be best to write these thoughts in Hindi to make it more clear.

हो चली शुरुआत

मिल गए गर सपने जो धूल में
तो क्या छुट गयी आस
अभी न जाने पल हैं कितने
मायने जो रखते ख़ास

उठो रे मानुष अब तुम जागो
निराशा के बंधन को फेंको
सारी कठिनायियो को दे दो मात
अब हो चली शुरुआत

अब हो चली शुरुआत
मुश्किलों को गले लगाने की
अब हो चली शुरुआत
कंटका - कीर्ण  रस्तों पे चलने की

अब इनसे डरना है क्या
अब इनसे छिपना है क्या
पानी है जो मंजिल अपनी
तो फिर इनसे बचना है क्या

सफलता है नहीं नपती
उन्चायियो  से जो तुमने पाई
सफलता उससे है नपती
ठोकरे जो उन तक  तुमने खायी

याद करोगे एक ये भी दिन
जब सारी दुनिया थी अन्धकार में लीन
याद आयेगी तब वो बात
जब हुई थी एक शुरुआत
  

Tuesday, 20 April 2010

DUKH


As far as I know, most of the guys of my age think literature as a crap. Pity they'll never understand the sheer pleasure of studying and understanding it.

दुःख

दुःख होता है मुझे
जब देखता हूँ  अपने  आस पास,
चहुँ ओर है अन्धकार व्याप्त
साहित्य के जो हुआ करते थे नायक,
हो रहा उनका अस्तित्व समाप्त.

दुःख होता है मुझे
जब देखता हूँ किशोरों को
कल  के जो हैं भारत,
समझते साहित्य को गारत.

क्या मुंशी प्रेमचंद, क्या तोल्स्तोय,
क्या थे दिनकर और कौन शक्स्पीअर.
हँसते इन नामों पर,
उड़ाते इनका मजाक.
जो भी था मूल्य इनका,
हो रहा अब खाक.

कौन समझाए इन्हें
कौन ये बताये.
साहित्य के प्रकाश थे वो
जिनकी प्रज्वलित ज्योति को,
फिर कोई कैसे जलाये.

दुःख होता है मुझे
जब देखता हूँ
आज के समाज को
छात्र वर्ग को
शिक्षक गणों को.

नहीं रही अब उनमे
वह जोशो खरोश.
जो कर देता था
साहित्य पंडितो को मदहोश.
दुःख होता है मुझे

Sunday, 18 April 2010

SHRADHANJALI


It really hurts when someone close to heart leaves suddenly for ever.......

श्रधांजलि

प्रेम दया अनुशासन - जीवन इन शब्दों का नाता था.
हर परिस्थिति में प्रसन्नता - ऐसा आपका नारा था.

आपके साथ बिताया  हर पल कभी नहीं मैं भूलूंगा,
आपसे मिला स्नेह धन सदैव सहेज कर रखूँगा.

कंटकाकीर्ण मार्ग कभी नहीं हुई आपके लिए समस्या.
आप रहते थे बिलकुल सहज
अब विदित हुआ की आप गृहस्थ आश्रम में कर रहे  थे तपस्या.

दूजे का कष्ट पर्वत और अपना कष्ट धूल समान,
कुल की मान मर्यादा का आपने रखा सदा सम्मान.

आपके पदचिन्हों पर रहूँगा सदा मैं अग्रसर,
आपने पथ पर अडिग रहूँगा, इसका साक्षी है इश्वर.

शत शत बार प्रणाम मैं करता हूँ आपको.
यह छोटी सी श्रधांजलि मैं भेंट करता हूँ आपको.

GOLGAPPE WALAH


Have you ever looked at the face of Golgappa Walah while eating beside his stall for a while? 

गोलगप्पे  वाला

जैसे ही घडी  शाम के पांच बजती है,
वैसे ही गोलगप्पे वाले  की दिनचर्या शुरू हो जाती है.

वह गरीब न जाने कितने संकटों का शिकार है.
पर क्या फिर भी उसके मुख पर किसी प्रकार का विकार है?

अगर आप उससे मिलोगे, सोचोगे संसार का सबसे प्रसन्न व्यक्ति है,
पर जान उसकी व्यथा कथा, विचारोगे, कौन सी उसमे शक्ति है?

कौन सी वह  शक्ति है, जो बेटी ब्याह के चिंता में भी मुस्कुराती है,
अपिरिमित क़र्ज़ का भार भी दबाती है,
और बुढ़ापे में जीर्ण शारीर से भी परिश्रम कराती है.

कारण तो सभी जानते हैं, आप भी और मैं भी,
एक वृध गोलगप्पे वाला है, जिसका कारण है परिवार और पैसा भी.

वह अपने सभी ग्राहकों के दुःख सुख में शामिल होता है,
उसका उदास मुख देखना प्रभु दर्शन के समान होता है.

लेकिन उसे  कभी किसी से शिकायत न रही.
उसकी ज़िन्दगी अपने ढर्रे पर चलती रही.

PREMARTH


Every mortal in this world get bitten at least once in his/her lifetime by the 'love bug'!!!!

प्रेमार्थ

'प्रेम!'........कितना मधुर, शीतल एवं नम्रता से परिपूर्ण है.
समस्त सृष्टि का आदि अंत इसमें संपूर्ण है.

प्रेम किसको नहीं? सबको है
शमा को परवाने से,
नभ को धरा से,
और फूलों को ओस से.

निश्छल, निर्गुण एवं आनंद का है यह एहसास,
हर प्रेमी रचते हैं प्रेम का एक नया इतिहास.

विश्वास की धरा पर ऐसा हो प्रेम का वादा,
कितनी भी मुश्किलें आयें, अडिग रहे यह नाता.

न रंग रूप से, न सौंदर्य के बनावटी परदे से,
प्रेम होता है आपसी मन एवं हृदय मिलाप के मधुर भाव से.

हर प्रेमी की है यह कसम,
जब तक संसार में हैं, तबतक रहेंगे हरदम संग.

SHIKSHAK KA MOLE

I was in Eighth grade when I thought of this poem.

शिक्षक का मोल

बात यह है नहीं पुरानी
पिछले दिनों की है यह कहानी.

भौतिकी के जो मेरे अध्यापक हैं
बड़े ही अनुशासनप्रिय एवं कर्मठ हैं.

छात्रों से है उनका व्यवहार अत्यंत नरम
किन्तु प्रश्नों के उत्तर नहीं देने पर हो जाते हैं गरम.

एक दिन उन्होंने प्रश्न किया मुझसे
उत्तर न देने पर मेरा सर झुक गया लज्जा से.

उन्होंने मुझे बहुत फटकार लगायी
मैंने भी अच्छे से पढने की कसम खायी.

अगले दिन मैं पूरी तयारी के साथ था
मेरा मन शांत तथा उत्साहित था.

उन्होंने सवाल कई पूछे मुझसे
मैंने भी उत्तर दिए फूर्ति से.

उस दिन थे मुझसे वे प्रसन्न
हर्ष से पुलकित था मेरा मन.

पास बुलाया मुझे उन्होंने
बड़े ही स्नेहमयी वाणी में बोले मुझसे,

बेटा! मेरी फटकार का बुरा मत मानना
मेरा अभिप्राय था तुम्हारा भविष्य सवारना.

उनके इन दो बोलो को मैं अच्छी तरह समझ गया
शिक्षक का क्या होता है मोल मैं अच्छी तरह जान गया.

Saturday, 17 April 2010

ZINDAGI

This one I wrote when one day I came from school and was doing some 'Atma Chintan'.........

ज़िन्दगी

आज स्कूल की छुट्टी के बाद,
घर पर मैं बैठा था अकेला.
सोच रहा था मैं,
क्या मिला मुझे इस ज़िन्दगी से?
वह बुद्धि जो आजतक सर्वोच्च स्थान  की अधिकारिणी न होने पाई?
या वह आंखे जो दूरदृष्टि की साक्षी नहीं?
वह शरीर जो किसी की सहायता में काम  न आई?
या वह मुखमंडल जो कभी दीप्तिमान न होने पाया?
पर फिर मैंने सोचा........नहीं! इतनी तो मुझ पर कृपा हुई,
जो मुझे ज़िन्दगी मिली.
मैं मानसिक रूप से विकलांग नहीं,
न ही मैं अपाहिज हूँ.
मेरे पास ज़िन्दगी तो है, जो मुझे देती है जीने की प्रेरणा.
भले आज समाज में मेरा कोई स्थान न हो,
पर इस प्यारी ज़िन्दगी के साथ कभी तो अपना स्थान बनाऊंगा!
मेरे माता पिता गौरवान्वित होंगे, और मैं देश के काम आऊँगा.
इसलिए हे मेरे मन! तू निराश न हो.
क्योंकि मेरे पास है एक बहुमूल्य तोहफा, जिसका नाम है.......
जिंदगी!

DUUR DESH KE SATHI

I wrote this poem a long time ago when a friend of mine who live in a distant country requested me to write something for him in Hindi. But since I have just created this blog, I am posting it now. Please feel free to leave your comments and let me know you liked it or not.:-)

  दूर देश के साथी   

दूर देश से आये साथी लेकर ढेरो खुशियाँ,
फिर से खिली हैं  यादों की वह सुनहली कलियाँ.

न हम उन्हें जानते, न उन्हें पहचानते,
कभी उनकी कोई खबर न सुनी, आप माने या न माने.

एक दिन वह आये घर मेरे, लेकर लडू और पेड़े,
हमने उनसे बातें की विनम्रता से, वे भी पेश आये नम्रता से.

उनसे मिलकर बात कोई दूसरी याद न आती,
संग उनके मुझे कमी किसी की नहीं खलती.

फिर आई वह दुखद घडी,
जब दिखाई उन्होंने झंडी हरी.

वापस आने का वादा कर,
चले गए वह मन मारकर.

आज उन्हें देख दोबारा, लौटी हैं पुरानी खुशियाँ,
फिर से खिली हैं यादों की वह सुनहली कलियाँ.