Saturday, 17 April 2010

DUUR DESH KE SATHI

I wrote this poem a long time ago when a friend of mine who live in a distant country requested me to write something for him in Hindi. But since I have just created this blog, I am posting it now. Please feel free to leave your comments and let me know you liked it or not.:-)

  दूर देश के साथी   

दूर देश से आये साथी लेकर ढेरो खुशियाँ,
फिर से खिली हैं  यादों की वह सुनहली कलियाँ.

न हम उन्हें जानते, न उन्हें पहचानते,
कभी उनकी कोई खबर न सुनी, आप माने या न माने.

एक दिन वह आये घर मेरे, लेकर लडू और पेड़े,
हमने उनसे बातें की विनम्रता से, वे भी पेश आये नम्रता से.

उनसे मिलकर बात कोई दूसरी याद न आती,
संग उनके मुझे कमी किसी की नहीं खलती.

फिर आई वह दुखद घडी,
जब दिखाई उन्होंने झंडी हरी.

वापस आने का वादा कर,
चले गए वह मन मारकर.

आज उन्हें देख दोबारा, लौटी हैं पुरानी खुशियाँ,
फिर से खिली हैं यादों की वह सुनहली कलियाँ.

                                                      

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