Sunday, 18 April 2010

SHIKSHAK KA MOLE

I was in Eighth grade when I thought of this poem.

शिक्षक का मोल

बात यह है नहीं पुरानी
पिछले दिनों की है यह कहानी.

भौतिकी के जो मेरे अध्यापक हैं
बड़े ही अनुशासनप्रिय एवं कर्मठ हैं.

छात्रों से है उनका व्यवहार अत्यंत नरम
किन्तु प्रश्नों के उत्तर नहीं देने पर हो जाते हैं गरम.

एक दिन उन्होंने प्रश्न किया मुझसे
उत्तर न देने पर मेरा सर झुक गया लज्जा से.

उन्होंने मुझे बहुत फटकार लगायी
मैंने भी अच्छे से पढने की कसम खायी.

अगले दिन मैं पूरी तयारी के साथ था
मेरा मन शांत तथा उत्साहित था.

उन्होंने सवाल कई पूछे मुझसे
मैंने भी उत्तर दिए फूर्ति से.

उस दिन थे मुझसे वे प्रसन्न
हर्ष से पुलकित था मेरा मन.

पास बुलाया मुझे उन्होंने
बड़े ही स्नेहमयी वाणी में बोले मुझसे,

बेटा! मेरी फटकार का बुरा मत मानना
मेरा अभिप्राय था तुम्हारा भविष्य सवारना.

उनके इन दो बोलो को मैं अच्छी तरह समझ गया
शिक्षक का क्या होता है मोल मैं अच्छी तरह जान गया.

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